घरों मे पलती हिंसा के चक्रब्यूह में महिलाऐ: समाजशास्त्रीय अध्ययन (जिला जांजगीर चांपा के रेलवे कालोनी की महिलाओं के विशेष संदर्भ में )
Dr. S.K. Agrawal1, Dr. V. Sengupta2
1Principal, T.C.L. Govt. P.G. College Janjgir
2Assitant Professor, Sociology, T.C.L.Govt. P.G. College Janjgir
*Corresponding Author E-mail: vsengupta11@gmail.com
ABSTRACT:
भारतीय नारी का विकास काफी धीमा हैं। आधुनिक भारत में नारियो की शिक्षा का पर्याप्त विकास हो गया हैं। किन्तु इस पुरूष प्रधान समाज में आज भी नारी को बराबरी का दर्जा देने में सुगबुगाहट हैं। यही नही समाज की रूढिवादी परम्परावादी एवं कम पढी - लिखीनारियो के विचारो में कुछ विशेष परिवर्तन आज भी नया नही आता हैं। नारियो के केवल एक तबके में आया परिवर्तन पूर्ण समाज की नारियो का परिवर्तन कहना अत्यंत अतिशयोक्ति ही हैं। गरीब में पुरूषो की आपेक्षा रोजी कमाने वाली नारियो की संख्या ही बढी हैं।
KEYWORDS: घरेलू हिंसा , चक्रब्यह/अत्याचार , महिलाए शारिरिक शोषण , सामाजिक स्थिति , आर्थिक स्थिति।
घरो में पलती हिंसा
महिला को दांपत्य जीवन की गाडी का एक पहिया माना जाता हैं। कहा जाता हैं कि दांपत्य जीवन तभी सुचारू रूप से चल सकता हैं। जब महिला और पुरूष मिलकर परस्पर सहयोग करे।विवाह को भारतीय संस्कृति में एक अहम संस्कार माना गया हैं। लेकिन दुर्भाग्य से विवाह जैसा यह पवित्र बन्धन भी एक मजबूरी बनकर रह गया हैं। अभी हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि हमारे यहां ऐसे लोगो का प्रतिशत भी अधिक हैं। जो अपने दांपत्य जीवन से संतुष्ट नही हैं। ऐसे लोगो का प्रतिशत भी अधिक ह। जो सामाजिक मजबूरी के कारण आज कल घर की चार दीवारी के भी हिंसा के मामले काफी बढ गए हैं। विशेष रूप से वैवाहिक हिंसा के मामले तो काफी अधिक बढ गए हैं। कुछ लोगो का मानना हैं। कि आज कल महिलाएँ भी घरो से बाहर आकर अपने पैरो पर खडी हो रही हैं। और चूकी वे अधिक रूप से आत्म निर्भरहो गई हैं। इसलिए अब उनके सहन करने की क्षमता कम हो गई हैं।
विवाह के संदर्भ में:-
यदि हम प्राचीन भारतीय साहित्य और संस्कृति का अध्ययन करे तो पता चलता हैं। कि उस समय व्यक्ति के कुल जीवन को 4 भागो में बाटा गया हैं। जिन्हे 4आश्रमो की संज्ञा दी गई थी व्यक्ति की सामान्य आयु तब 100 वर्ष आंकी गई इस लिए इस 100 वर्षो की जीवनावधि को 25-25 वर्षो के चार आश्रमो में बांटा गया था।ब्रह्ाचर्य , गृहस्थ ,वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम वैवाहिक जीवन से संबंधित गृहस्थआश्रम ,चारो आश्रम में सर्वधिक महत्वपूर्ण था। ब्रह्ाचर्य जीवन में व्यक्ति अपनी शिक्षा-दीक्षा पूरी करना था। और पुरूष और स्त्री एक दुसरे के पूरक हैं। और एक दुसरे में अपना सहरा ढूढने के लिए वे वैवाहिक संबंधो का स्वीकार करते हैं। ऐसे हमारे धर्म ग्रंन्थो का विचार था।
उद्देश्य -
1 ़ अत्याचार/महिला हिंसा को जड़ से समाज से सामप्त करना हैं।
2 ़नव युवतियाँ को अत्याचार छेड़छाड़ से बचाने के लिए जागृत रहना।
3 ़ नवयुक्ती को बचपन से ही अपनी बचाव के लिए सीख देना आदि।
परिकल्पना:-
1 ़अत्याचार वर्तमान संदर्भ मे काॅफी वृध्दि स्तर पर है।
2 ़हिंसा पर नियत्रण शासन केद्वारा संभव है।
3 ़महिलाओं को हिस्सा/अत्याचार पर नियंत्रण हेतु कठोर कदमउठाना होगा।
महिलाओं के प्रति बढते अत्याचार:-
स्त्रियो के संदर्भ में भारतीय समाज मे दो प्रकार के द़ृष्टिकोण पाए जाते है। एक दृष्टिकोण समाज में स्त्रि को पुरूषो के समक्ष सम्मान एवं प्रस्थिति दिलाने के पक्ष ेमं है, तो दूसरा दृष्टिकोण उन्हे पुरूषो से भिन्न दर्जे का मानता है। अतः उन्हे अनेक अघिकारो से वंचित करने के पक्ष में हैं। नारी जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी आंचल में है। दुध और आँखो में पानी महिलाओं के प्रति हिंसा एवं अपराध कोई आज के युग की ही घटना नही है। वरन प्रचीन भारत में भी इसके अनेक उदा ़मिलते हैं। महाभारत काल में युधिष्ठर ने अपनी पत्नी द्रोपति को जुए में दाव पर लगा दिया था और दुर्योधन ने भरी सभा में उसका चिर हरण कर अपमानित किया था। रामायण काल में रावण ने सीता का अपहरण किया था।इस प्रकार महिलायो का उत्पीड़न एवं शोषण उनके साथ बलात्कार उन्हे बहला फुसला कर भाग ले जाना एवं वैष्यावृत्र्ता के लिए उन्हे बेच देना उनके साथ मारपीट एवं गाली गालोज करना उन्हे जला देना उनके हत्या कर देना आदि । महिला अपराध के कुछ प्रमुख उदाहरण हैं।नन्दिता गांधी एवं नन्दिता साह ने स्पष्ट करते हुए लिखा हैं। महिला के प्रति हिंसा के अतर्गत बलात्कार दहेज हत्याए पत्नी का यातनाए देने यौनिक हतोत्साहन तथा संचार माध्यम में स्त्री को गलत दव से समाहित किया जा सकता हैं।महिलाओ के विरूध्द हिंसा उनके उददेष्यो के आधार पर निम्नाकित प्रकार की हो सकती हैं।
1 जिस हिंसा का उददेष्य धन प्राप्त करना होता हैं। जैसे दहेज के पत्नी को पीटना एवंयातनाए देना।
2 जिस हिंसा का उध्देष्य कमजोर पर सजा कायम करना होता हैं।
3 जिसका उध्देष्य यौन प्राप्त करना होता हैं।
4 जो हिंसा अपराधकर्ता के व्यक्तित्व संबंधित विवृति के करण की जानी हंै।
5 जिस हिंसा का करण तनाव पूर्ण पारिवारिक परिस्थितिया होती हैं।
6जो हिंसा पीड़ित महिला द्वारा प्रेरितहोती हैं।
महिलाओ के विरूध्द हिंसा की एक अन्य वर्गीकरण में हिंसा को निम्न भागो में विभक्त किया जा सकता हैं।
1 अपराधिक हिंसा जैसे बलात्कार एवं हिंसा आदि।
2 घरेलू हिंसा जैसे दहेज संबंधि मृत्यू पत्नी को पीटना लैगिक दुव्यहार आदि।
3 सामाजिक हिंसा जैसे पत्नी एवं पुत्र वधु को मादा भ्रूण हत्या के लिए बाध्य करना महिलाओ से छेड़छड़ विधवा को सती होने के लिए बाध्य करना दहेज के लिए तंग करना एवं स्त्री को सम्पति में हिस्सा न देना आदि ।हम महिलाओ के प्रति हिंसा के विभिन्न रूपो एवं अनेक कारणो का उल्लेख करेंगे
बलात्कारः-
भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 के अनुसार बलात्कार एवं दण्डनीय अपराध का आजीवन कारावास तक हो सकता हैं। इस धारा के अनुसार जब कोई पुरूष किसी स्त्री से उसकी इच्छा के विरूध्द या संपत्ति के बिना या मृत्यू का भय दिखाकर सम्पति से संभोग करता हैं। तो वह बलात्कारी कहलाता हैं।
महिलाओ के प्रति बढ़ते अत्याचारः-
के प्रयत्न के प्रतिसंघर्ष किया बलात्कार के जितने मामले हुए उनमे से आधे स्त्री के घर पर और आधे बलात्कारी के घर पर हूए जिस महिलाओ के साथ बलात्कार हूए उनमे से अधिकांस उस घटना को भुला देना चाहती हैं। जिन महिलाओ के साथ बलात्कार किया गया उनकी विशेषतए इस प्रकार है।
1 अधिकांशतः बलात्कार गरीब महिलाओ के साथ हुए।
2 कामकाजी महिलाओ के साथ बलात्कार उनके आॅफिस के बस द्वारा किए जाते हैं।
3 फैक्ट्री मे काम करने वाली श्रमिक महिलाओ के साथ बलात्कार उनके मालिको द्वाराकिऐ जाते हैं।
4 अस्पताल मे मरिजो के प्रति बलात्कार अस्पताल के कर्मचारी द्वारा किए जाते हैं।
5 जेल मे महिला कैदियो के साथ बलात्कार जेल कर्मचारियो द्वारा किए जाते हैं।
6 आवारा गर्दी करने वाली संदिग्ध हालत मे पायी जाने वाली स्त्रियो के साथ बलात्कार पुलिस कर्मियो द्वारा किए जाते हैं।
7 पागल गूंगी बहरी अपंग एवं भिखारिन महिलाओ के साथ भी बलात्कार किए जाते हैं।
अमेरिका में एक स्त्री संगठन ने बलात्कार से बचने के लिए कुछ उपाय सुझाएहैं।
1 अपने घरो को अत्यधिक सुरक्षित बनाइए । घर के ताले खिड़कियां एवं दरवाजे कार्य करने की स्थिति में होने चाहिए। यदि आप घर बदले तो ताले भी बदल दीजिए।
2 यदि आप अकले रह रहे हैं। तो ऐसे प्रकट करे कि यहां एक से अधिक व्यक्ति रहते हैं। यह बहाना करे की घर में पुरूष भी हैं।
3 दरवाजे पर पूरा नाम लिखने के स्थान पर अपना
4 अजनबी से दूर रहे तथा अजनबी के आने पर दरवाजा न खोले ।
5 निर्जन मकानो में अकेले न रहे।
6 रात्री मे गलियो एवं विश्वविद्यालयो में अकेले न घुमे।
7 अपने पास हथियार लाइटर कांटे छूरी एवं सीटी रखे। समूह मे घुमे अकेले नही।
8 यदि आप कार चलाती हैं। तो कार के दरवाजे बिना ताला लगाये न छोडे़ तथा कार में बैठने के पूर्व पीछे के सीट के जांच करले ।
9 आक्रमण होने पर बलात्कार न चिल्लाये वरन कहे गोली चलाओ गोली चलाओ ।
विधवाओ के प्रति हिंसा:-
भारत में विशेष रूप से हिन्दुओ में विधवाओ के एक गंभीर समस्या हैं। क्योकि हिन्दुओ में विवाह एक धार्मिक संस्कार माना गया हैं। और पति पत्नी का जन्मजन्मातर का बन्धन हैं। जिसे तोड़ नही जा सकता अतः पति के मृत्यू के बाद पत्नी को दुसरा विवाह करने की छुट नही हैं।
नारी हत्या एवं भ्रूण हत्या
भारतीय समाज पुरूष प्रधान हैं। तथा यहा लडकी की तुलना में लड़के को अधिक महत्व दिया जाता हैं। धार्मिक दृष्टि से भी पुत्र प्राप्ति आवश्यक माना जाता हैं। क्योकि वही श्राध्द एवं तर्पण द्वारा मृत पिता एवं पूर्वजो को स्वर्ग पहुचाता हैं।
छेड़छाड़:-
नारी के विरूध्द अपराधभी एक बढ़ती हुई प्रवृत्ति हैं। महाविद्यालय परिसर में रेलो एवं बसो में बाजारो में मनचले एवं दण्ड उदण्ड किस्म के लड़के द्वारा लड़कियो को को भध्दे गंदे इसारे किए जाते हैं।
हिंसा के शिकार कौन:-
1 जो गरीब असहाय एवं अवसाद ग्रस्त होती हैं। जो स्वंय अपनी नजरो से गिर चुकी हैं।
2 जो विघटित परिवारो में रहती हैं। तथा जिन पर परिवार के सदस्यो का दबाव बना रहता हैं।
3 जिसके ससूराल पक्ष के लोग विकृत व्यक्तित्व के होते हैं।
4 जिनके पति शराबी होते हैं।
म्हिलाओ के विरूध्द हिंसा के कारण:-
ऽ पुरूष प्रधान स्त्रियो की पुरूषो पर आर्थिक निर्भरता।
ऽ अशिक्षा ,महिलाओ के प्रति विद्वेष।
ऽ सामाजिक कुप्रथाएं,पारिवारिक तनाव ,पीड़ित द्वारा भड़काना।
ऽ नशा,अपराधी के प्रति निश्क्रियता,परिस्थितिवश प्रेरणा।
निष्कर्ष:-
वर्तमान में महिलाएं घरो में भी और कार्य स्थलो में भी असुरक्षा महसूस कर रही हैं। आज की शिक्षित नारी समय और शिक्षा दोनो के महत्व को जानती हैं।आज प्रत्येक क्षेत्र में नारी की सक्रिय भूमिका देश के निर्माण में लगी हैं।
संदर्भ सूची:-
1 धावऩ डाॅ ़ हरिमोहन-“महिला सशक्तिकरण विविध आयाम प्रकाशक - मध्यप्रदेश दलित साहित्य अकादमी।
2 श्रीवास्तव सुधारानी -“महिला उत्पीड़न और वैधानिक उपचार प्रकाशक - अर्जून पब्लिशिंग हाउस।
3 सिंह ड़ाॅ ़ निशांत -“भारतीय महिलाए एक सामाजिक अध्ययन प्रकाशक - ओमेगा पब्लिकेशन्स।
4 सिंह मिनाक्षी निशांत -“महिला सशक्तिकरण सच प्रकाशक - ओमेगा पब्लिकेशन्स।
5 ओझा चितरंजन -“नारी शिक्षा एवं सशक्तिकरण प्रकाशक - चितरंजन ओझाा।
6 सिंह मिनाक्षी निशांत -“महिला सशक्तिकरण का सच“ ओमेगा पब्लिकेशन्स आंसरी रोड़ दरियांगंज नई दिल्ली पेज न ़ 108 से 113 तक।
7 मिश्रा एम ़ के ़ शर्मा रमा-“भारतीय समाज में नारी का अवधारणात्मक स्वरूप अर्जून पब्लिशिंग हाउस। पेज न ़ 169।
Received on 11.10.2017 Modified on 15.01.2018
Accepted on 21.02.2018 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2018; 6(1):Page 71-74 .